चंद अशआर जो रातों में हमको और आपको भी
जगाये रखते हैं
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अहले-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैं
एक हम ही नहीं दुनिया से ख़फ़ा और भी हैं।
सर सलामत है तो क्या संग-ए-मलामत की कमी
जान बाकी है तो पैकान-ए-कज़ा और भी हैं।
साहिर साहब
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सब्ज़ा-ज़ारों की शराफ़त से न खेलो क़तअन,
तुम हवा हो, तो ख़लाओं से लिपट कर देखो।
"राही फ़िदाई"
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ज़िंदगी तू ने क़दम मोड़ दिए और तरफ़
और अंदर से मुझे और सफ़र पर रक्खा
📝🔹शायर🔹अब्बास ताबिश🔹🔹
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माझी तेरे कश्ती के तलबदार बहुत हैं,
इस पार कुछ मगर उस पार बहुत हैं,,,
जिस शहर में तुने खोली है शीशे की दुकान,
उस शहर में पत्थर के खरीदार बहुत हैं...
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कश्ती में मेरी उसने कई छेद कर दिए,
में इसके बा वजूद नदी पार कर गया।
"फरियाद बहादुर"
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बहुत हसीन सही सोहबतें गुलों की मगर।
वो ज़िन्दगी है जो कांटों के दरमियाँ गुज़रे।
जिगर।
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मैं ने समझा था मैं मोहब्बत हूँ।
कितनी बे-साख़्ता ख़ता हूँ मैं।
हश्र की सुब्ह तक तो जागूँगा।
रात का आख़िरी दिया हूँ मैं।
अदम
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अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे
दिल की आहट से तेरी आवाज़ आती है मुझे
ये समाअत का भरम है या किसी नग़्में की गूँज
एक पहचानी हुई आवाज़ आती है मुझे
अदम
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मुझे भी चेहरे पे रौनक़ दिखाई देती है
ये मोजज़ा है तबीबों की ख़ुश-बयानी का
करम के रंग निहायत अजीब होते हैं
सितम भी एक तरीक़ा है मेहरबानी का
अदम
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बढ़ के तूफ़ान को आगोश में ले-ले अपनी
डूबने वाले तेरे हाथ से साहिल तो गया.
अदम
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सवाल कर के मैं ख़ुद ही बहुत पशेमाँ हूँ
जवाब दे के मुझे और शर्म-सार न कर.
अदम
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या मैं सोचूँ कुछ भी न उस के बारे में
या ऐसा हो दुनिया और बदल जाए
शहरयार
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